जीवित्पुत्रिका व्रत कथा संपूर्ण
॥ श्री जीवित्पुत्रिका व्रत कथा ॥
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक राजा और रानी रहते थे। उनके पास अपार धन-संपत्ति थी, लेकिन संतान सुख नहीं था। अनेक वर्षों तक उन्होंने यज्ञ, दान और पूजा की, तब जाकर उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई। पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया।
राजकुमार धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। राजा और रानी अपने पुत्र से अत्यंत प्रेम करते थे। लेकिन कुछ समय बाद ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि बालक पर अल्पायु का संकट है। यह सुनकर रानी अत्यंत दुखी रहने लगी।
एक दिन महल में एक वृद्ध साध्वी आई। उसने रानी को उदास देखकर कारण पूछा। रानी ने अपने पुत्र की अल्पायु का भय बताया। साध्वी ने कहा — “यदि तुम श्रद्धा और नियम से जीवित्पुत्रिका व्रत करोगी, तो तुम्हारा पुत्र दीर्घायु होगा।”
साध्वी ने रानी को व्रत की विधि समझाई। उसने कहा — “आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन यह व्रत किया जाता है। माताएँ अपने पुत्रों की लंबी आयु और सुखी जीवन के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। जिमूतवाहन भगवान की पूजा की जाती है और कथा सुनी जाती है।”
रानी ने पूरे श्रद्धा भाव से व्रत करने का संकल्प लिया। उसने प्रातः स्नान करके व्रत आरंभ किया। पूरे दिन बिना अन्न और जल के भगवान का स्मरण करती रही। संध्या समय उसने जिमूतवाहन भगवान की पूजा की और कथा सुनी।
कथा के अनुसार प्राचीन समय में जिमूतवाहन नामक एक महान और दयालु राजा थे। वे अत्यंत धर्मात्मा और प्रजा हितैषी थे। एक दिन उन्होंने देखा कि नागवंश पर संकट है। गरुड़ प्रतिदिन एक नाग को भोजन के रूप में ले जाता था।
एक वृद्ध नागमाता अपने पुत्र के लिए रो रही थी क्योंकि अगले दिन उसके पुत्र की बारी थी। जिमूतवाहन को उस माता पर दया आ गई। उन्होंने निश्चय किया कि वे स्वयं नाग के स्थान पर जाकर गरुड़ के सामने प्रस्तुत होंगे।
अगले दिन जिमूतवाहन लाल वस्त्र पहनकर पर्वत पर लेट गए। गरुड़ उन्हें नाग समझकर उठाने लगा। तभी गरुड़ को पता चला कि यह कोई नाग नहीं बल्कि एक महान राजा है जो दूसरों की रक्षा के लिए अपना जीवन त्यागने आया है।
गरुड़ जिमूतवाहन के त्याग और दया से अत्यंत प्रभावित हुआ। उसने वचन दिया कि अब वह किसी नाग को नहीं मारेगा। जिमूतवाहन की महिमा चारों ओर फैल गई। तभी से माताएँ अपने पुत्रों की रक्षा और लंबी आयु के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत करने लगीं।
रानी ने भी पूरी श्रद्धा से यह व्रत किया। भगवान की कृपा से उसका पुत्र सभी संकटों से सुरक्षित रहा और दीर्घायु हुआ। पूरे राज्य में आनंद छा गया।
धीरे-धीरे जीवित्पुत्रिका व्रत की महिमा दूर-दूर तक फैल गई। माताएँ अपने बच्चों की रक्षा और सुखमय जीवन के लिए यह व्रत करने लगीं।
कहा जाता है कि जो माता श्रद्धा और नियम से जीवित्पुत्रिका व्रत करती है, उसकी संतान पर आने वाले बड़े से बड़े संकट टल जाते हैं। बच्चे स्वस्थ, दीर्घायु और सफल होते हैं।
॥ व्रत विधि ॥
आश्विन कृष्ण अष्टमी को प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें। पूरे दिन निर्जला व्रत रखें। जिमूतवाहन भगवान का चित्र स्थापित करें। फल, फूल, धूप, दीप अर्पित करें। जीवित्पुत्रिका व्रत कथा सुनें। संतान की लंबी आयु की प्रार्थना करें। अगले दिन पारण करें।
॥ व्रत का महत्व ॥
यह व्रत विशेष रूप से संतान की रक्षा, लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। माताएँ श्रद्धा से यह व्रत करके अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं।
॥ श्री जीवित्पुत्रिका व्रत कथा समाप्त ॥
Jivitputrika Vrat Katha Complete
Complete Jivitputrika Vrat Katha with vrat vidhi, significance and blessings for children’s protection and long life.